हमारी दादियां नानियां न जाने कितनी बार मारीं जाती हैं, उन्हें भी पता नहीं होगा। बहुत सारी दादियां मरने से पहले गंभीर रूप से बीमार पड़ती हैं। कुछ दादियों को अचानक चेकअप के लिए ले जाना पड़ता है। स्कूल, कालेज और दफ्तर में बहानेबाज़ी के अचूक हथियार के रूप में दादी का मरना,बीमार पड़ना आम होता जा रहा है। और कारगर भी। पहले भी इस बहाने का इस्तमाल होता था और आज कल भी हो रहा है। वो लोग भी इस बहाने का इस्तमाल करते हैं जिनकी दादी कब की मर चुकी है या जिन्होंने दुनिया में आने के बाद से ही अपनी दादी को कभी नहीं देखा।
मेरे दोस्तों को इस तरह का अनुभव हो रहा है। वो दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं। एक छात्रा ने अपनी दादी को इसलिए मार दिया क्योंकि वो समय पर अपना असाइन्मेंट नहीं कर सकी थी। उसी छात्रा ने किसी और टीचर के सामने अपने चाचा को मृत घोषित कर दिया। शायद यह छात्रा स्कूल के दिनों से दादी को बीमार बताते बताते बोर हो गई होगी। कालेज में आकर लगा होगा कि कितने दिन बीमार रहेगी अब तो मरने का भी वक्त आ गया है। स्कूल के दिनों में भी कई लोग इस तरह के बहाने करते थे। इस पर एक राष्ट्रव्यापी शोध होना चाहिए कि भारतीय छात्र छात्राएं छुट्टी लेने या काम न पूरा करने के लिए क्या क्या कारण देते हैं? मातहत अपने अफसर से छुट्टी पाने के लिए क्या बहाने करते हैं। मैं अपनी बेटी का बर्थ सर्टिफिकेट सत्यापित कराने के लिए नोएडा के एसएसपी के दफ्तर में बैठा था। एक सिपाही आया। जनाब छुट्टी चाहिए। क्यों? एसएसपी ने पूछा। मेरी दादी मर गई है। कब मरी है? परसो साब। कितने दिन की छुट्टी चाहिए?। साब तेरह दिन की। एसएसपी नाराज़ हो गए। बोले कि एक तो तीन दिन बाद छुट्टी मांग रहा है और वो भी तेरह दिन की। तुरंत बाद एक और सिपाही आया। साब छुट्टी की दरख्वास्त है। क्यों चाहिए छुट्टी? जनाब दादा जी बीमार हैं। आगे कहने की ज़रूरत नहीं हैं।
पता नहीं कितने बच्चों के साथ दादी रहती होगी। ये बच्चे अपनी दादी को मारने में संकोच नहीं करते। शायद इससे पता चलता है कि हमारे घरों में दादियों की बाकी बची ज़िंदगी की हालत क्या है? शायद घरों में दादियों की हालत मरी हुई जैसी ही है। उनके साथ ऐसा ही व्यावहार होता होगा या फिर अब मरी कि तब मरी के रुप में मरने का इंतज़ार होता होगा। कोई भावनात्मक संबंध नहीं होगा। कई घरों में दादियां रहती ही न होंगी। जहां रहती होंगी वहां मौत के करीब या मरने वाली दादी ही मानी जाती होगी। तभी एक छोटे से काम के लिए बच्चे स्वाभाविक रुप से अपनी दादी को मार देते हैं। जबकि घरों में जाइये तो बच्चे के लिए दादी का दिल बहुत पिघलता है। काश दादी को पता होता कि ये बच्चा जिसे वो पुचकारना चाहती है, वही आज उन्हें अपने प्रोफेसर के सामने मृत घोषित कर आ रहा है। हंसती बोलती सफेद धवल हमारी दादियां। जिनके साये में हम बड़े होते हैं। पलते रहते हैं। महफूज़ रहते हैं। वो हमें ज़रा सी चोट लगने पर घर आसमान पर उठा लेती हैं। हम उन्हें मारते रहते हैं।
जो भी इस लेख को पढ़ रहा है क्या वह स्वीकार करने का हौसला दिखाएगा कि उसने भी किसी प्रसंग में दादी या किसी रिश्तेदार के बीमार होने से लेकर मर जाने तक का बहाना किया है। यह एक गंभीर सामाजिक शोध का विषय हो सकता है। इससे पता चलेगा कि झूठ बोलने के इन मौकों में हम किन किन लोगों का इस्तमाल करते हैं। कुछ लोगों ने बताया कि मां बीमार है कहने में कलेजा कांप जाता है। पापा को बीमार कह नहीं सकते। दादी ही है जिसे बीमार से लेकर मारा भी जा सकता है। मैं उन तमाम दादियों की आत्मा की शांति के प्रार्थना करता हूं जिनके पोते पोतियां उन्हें मार देते हैं। झूठ की सामाजिकता इन्हीं सब बहानों से बनती जाती है। ईश्वर सभी दादियों को बहुत लंबी उम्र दे ताकि उनके पोते पोतियों को मारने का यह बहाना कई सालों तक काम आता रहे। बल्कि दादियों के लिए एक आइडिया है। वो पता करती रहें कि पोती ने होमवर्क किया है या नहीं. या फिर स्कूल गई है या नहीं। जब भी उन्हें लगे कि ऐसा हुआ है तो वो झट से स्कूल फोन कर दें औऱ बता दें कि मैं मरी नहीं हूं। बीमार नहीं हूं। ज़िंदा हूं। दादियों को भी स्ट्रीट स्मार्ट होना होगा।
Monday, February 25, 2008
क्या आपको भी ऊब होती
हर काम से ऊब होती है। एक न एक दिन होती है। सबको होती है। मुझे भी होती है। लगता है जहां हूं वहां क्यों हूं। जहां नहीं हूं वहां क्यों नहीं हो जाता हूं। यह काम अच्छा नहीं है। वह काम अच्छा है। उस काम वाले से मिलता हूं तो कहता है आपका काम बड़ा अच्छा है। ऊब से कंफ्यूज़ हो जाता हूं। लगता है टीवी नहीं अख़बार ठीक है। अख़बार कहता है टीवी ठीक है। अपने दफ्तर को भला बुरा दूसरे दफ्तर को ठीक समझने लगता हूं। दूसरे दफ्तर वाले से मिलने के बाद अपने दफ्तर को ठीक समझने लगता हूं। लगता है हर अच्छी चीज़ बुरी होती है और हर बुरी चीज़ अच्छी होती है। मैं ऊब रहा हूं। इन दोनों ही स्थितियों से। कुछ नया करना चाहता हूं। पिछले दिनों जो नया किया उन्हीं से ऊब गया हूं। फिर एक और बार ऊबने के लिए कुछ और नया क्यों करना चाहता हूं।
शर्मा जी पड़ोसी थे। ज़िंदगी भर एक ही मेज़ से क्लर्की करते रिटायर हो गए। रिटायरमेंट के दिनों तक पहुंचते पहुंचते उनकी मेज़ चमकने लगी थी। सागवान की लकड़ी संगमरमर लगने लगी थी। तीस साल एक ही कुर्सी और एक ही मेज़। बैठने की एक ही जगह। दफ्तर के काम की कोई प्रगति नहीं। सिर्फ दिन बीतने की प्रगति। पहले दिन से रिटायर होने के आखिरी दिन तक पहुंचने की प्रगति। शर्मा जी ने कभी नहीं कहा कि ऊब गया हूं। हर दिन दफ्तर जाते रहे। कभी नहीं कहा कि दूसरे दफ्तर में क्यों हूं। पर दावे के साथ नहीं कह सकता कि शर्मा जी ऊब से बेचैन नहीं होंगे। एक ही करवट बैठे बैठे और हर सर्दी में पत्नी का बुना नया स्वेटर पहनते हुए वह अपनी ऊब किससे कहते होंगे पता नहीं। ऐसे तमाम लोगों पर शोध होना चाहिए। वो एक ही तनख्वाह, एक ही दफ्तर और एक ही दिशा में बैठे बैठे ऊबते क्यों नहीं हैं। हम क्यों ऊब जाते हैं। मैं क्यों ऊब जाता हूं।
शर्मा जी पड़ोसी थे। ज़िंदगी भर एक ही मेज़ से क्लर्की करते रिटायर हो गए। रिटायरमेंट के दिनों तक पहुंचते पहुंचते उनकी मेज़ चमकने लगी थी। सागवान की लकड़ी संगमरमर लगने लगी थी। तीस साल एक ही कुर्सी और एक ही मेज़। बैठने की एक ही जगह। दफ्तर के काम की कोई प्रगति नहीं। सिर्फ दिन बीतने की प्रगति। पहले दिन से रिटायर होने के आखिरी दिन तक पहुंचने की प्रगति। शर्मा जी ने कभी नहीं कहा कि ऊब गया हूं। हर दिन दफ्तर जाते रहे। कभी नहीं कहा कि दूसरे दफ्तर में क्यों हूं। पर दावे के साथ नहीं कह सकता कि शर्मा जी ऊब से बेचैन नहीं होंगे। एक ही करवट बैठे बैठे और हर सर्दी में पत्नी का बुना नया स्वेटर पहनते हुए वह अपनी ऊब किससे कहते होंगे पता नहीं। ऐसे तमाम लोगों पर शोध होना चाहिए। वो एक ही तनख्वाह, एक ही दफ्तर और एक ही दिशा में बैठे बैठे ऊबते क्यों नहीं हैं। हम क्यों ऊब जाते हैं। मैं क्यों ऊब जाता हूं।
Sunday, February 24, 2008
मेरे बारे में.
हर वक्त कई चीज़ें करने का मन करता है। हर वक्त कुछ नहीं करने का मन करता है। ज़िंदगी के प्रति एक गंभीर इंसान हूं। पर खुद के प्रति गंभीर नहीं हूं। लिखने को मैं गंभीर विषय नहीं मानता हूं। तब बोलने को भी साहित्य की तरह गंभीर विषय की मान्यता देनी होगी। इसलिए मैं बोलने को लिखने से ज़्यादा महत्वपूर्ण मानता हूं क्योंकि यही मेरा पेशा भी है। इस ब्लाग में जो कुछ भी लिखता हूं वो मेरे व्यक्तिगत विचार है । यहां लिखी गई बातों को मेरे काम से जोड़ कर न देखा जाए । वैसे यह बहुत मुश्किल काम है ।
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